न्यायिक पृथक्करण की याचिका (धारा 10 हिंदू विवाह अधिनियम)
विवाह समाप्त किए बिना जीवनसाथी को साथ रहने के दायित्व से मुक्त करने वाली डिक्री, धारा 13(1) के किसी भी तलाक़ के आधार पर।
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काग़ज़ की शुरुआत
दस्तावो के नमूना विवरण के साथ; लोग और जगहें काल्पनिक हैं। नीले शब्द वे हैं जो आप भरते हैं।
न्यायालय श्रीमान प्रधान न्यायाधीश, पारिवारिक न्यायालय, शांतिपुर
हिंदू विवाह अधिनियम याचिका नं. ______ सन् 2026
बनाम
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 10 के अंतर्गत न्यायिक पृथक्करण की डिक्री हेतु याचिका
निवेदन है कि:-
1.यह कि याचिकाकर्ता और प्रतिवादी का विवाह दिनांक 14-02-2021 को शांतिपुर में हिंदू रीति-रिवाज़ों से संपन्न हुआ। दोनों पक्षों पर हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 लागू होता है।
2.यह कि इस विवाह से कोई संतान नहीं हुई।
3.यह कि विवाह के बाद पक्ष पति-पत्नी के रूप में साथ रहे, आख़िरी बार मकान नं. 204, सेक्टर 9, शांतिपुर में, और दिनांक 01-06-2024 से वे अलग रह रहे हैं।
4.यह कि याचिकाकर्ता निम्नलिखित आधारों पर न्यायिक पृथक्करण की डिक्री चाहता है, जिनमें से हर एक अधिनियम की धारा 13(1) के अंतर्गत तलाक़ का आधार है:
(क)परित्याग (धारा 13(1)(ib)): प्रतिवादी ने दिनांक 01-06-2024 से, बिना उचित कारण और याचिकाकर्ता की सहमति के बिना या उसकी इच्छा के विरुद्ध, याचिकाकर्ता का परित्याग कर रखा है, और यह परित्याग इस याचिका के प्रस्तुत होने से ठीक पहले लगातार कम से कम दो वर्ष से चला आ रहा है: उस दिन वह यह कहकर वैवाहिक घर से कल्याणपुर में अपने मायके चली गई कि वह वापस नहीं आएगी, और याचिकाकर्ता व उसके माता-पिता के दिनांक 20-07-2024 और 05-01-2025 को वहाँ जाने के बावजूद वह नहीं लौटी;
बाक़ी काग़ज़ दस्तावो में है।
साथ क्या लाएँ
साथ लाने वाले काग़ज़
- विवाह का सबूत: पंजीकरण हुआ हो तो विवाह प्रमाण पत्र, नहीं तो शादी का कार्ड और रस्मों की फ़ोटो
- आधार कार्ड या कोई अन्य फ़ोटो पहचान पत्र, मौजूदा पते के सबूत सहित (फ़ोटोकॉपी; दिखाने के लिए मूल)
- न्यायालय के नोटिस के लिए दूसरे जीवनसाथी का पूरा मौजूदा पता (और फ़ोन नंबर, यदि पता हो)
- बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र, यदि बच्चे हों (फ़ोटोकॉपी)
- हर आधार के समर्थन के काग़ज़, तारीख़ों सहित: मेडिकल रिकॉर्ड, पुलिस शिकायतें या डीडीआर, संदेश और पत्र, और गवाहों के नाम-पते
- आपके बीच किसी पुराने या लंबित मुक़दमे की याचिकाओं और आदेशों की प्रतियाँ: भरण-पोषण, घरेलू हिंसा, एफ़आईआर या कोई अन्य याचिका
- पासपोर्ट साइज़ फ़ोटो, आमतौर पर दो या तीन
कहाँ जाना है
वकील के माध्यम से उस ज़िले के पारिवारिक न्यायालय (न हो तो ज़िला न्यायाधीश) में दाख़िल होती है जहाँ विवाह हुआ, जहाँ दूसरा जीवनसाथी रहता है, जहाँ आप आख़िरी बार साथ रहे या, पत्नी के लिए, जहाँ वह अब रहती है। न्यायालय आमतौर पर पहले पक्षों को मध्यस्थता या काउंसलिंग के लिए भेजता है।
फ़ीस
जहाँ ज़रूरी हो, कोर्ट फ़ीस और वेलफ़ेयर टिकट अदालत के दफ़्तर के निर्देश अनुसार लगते हैं; आज की राशि काउंटर पर पूछें। वकील की फ़ीस अलग है।
ध्यान दें
- न्यायिक पृथक्करण से विवाह समाप्त नहीं होता: कोई भी जीवनसाथी दोबारा विवाह नहीं कर सकता। इससे याचिकाकर्ता दूसरे जीवनसाथी के साथ रहने के दायित्व से मुक्त होता है।
- डिक्री के बाद एक वर्ष या अधिक तक फिर साथ न रहें तो कोई भी तलाक़ माँग सकता है (धारा 13(1ए)); सुलह हो जाए तो याचिका पर न्यायालय डिक्री रद्द कर सकता है (धारा 10(2))।
- मुक़दमा चलते समय गुज़ारा भत्ता और मुक़दमे का ख़र्च माँगा जा सकता है: "अंतरिम भरण-पोषण व मुक़दमे का ख़र्च (धारा 24 हिंदू विवाह अधिनियम)" देखें।
काग़ज़ और फ़ीस बदल सकते हैं। जाने से पहले दफ़्तर से पूछ लें। केवल जानकारी के लिए, अभी वकील ने नहीं जाँची।
स्टाम्प पेपर
इस याचिका या प्रार्थना पत्र पर कोर्ट फ़ीस राज्य के कोर्ट फ़ीस क़ानून से तय होती है; कोर्ट फ़ीस टिकट (या ई-कोर्ट फ़ीस की रसीद) और वेलफ़ेयर टिकट अदालत के दफ़्तर के निर्देश अनुसार लगाएँ।