न्यायिक पृथक्करण की याचिका (धारा 10 हिंदू विवाह अधिनियम)

विवाह समाप्त किए बिना जीवनसाथी को साथ रहने के दायित्व से मुक्त करने वाली डिक्री, धारा 13(1) के किसी भी तलाक़ के आधार पर।

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काग़ज़ की शुरुआत

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न्यायालय श्रीमान प्रधान न्यायाधीश, पारिवारिक न्यायालय, शांतिपुर

हिंदू विवाह अधिनियम याचिका नं. ______ सन् 2026

अनिल वर्मा पुत्र श्री रमेश वर्मा, आयु लगभग 31 वर्ष, निवासी मकान नं. 204, सेक्टर 9, शांतिपुर, ज़िला शांतिपुर, हरियाणा
…याचिकाकर्ता

बनाम

नेहा वर्मा पत्नी श्री अनिल वर्मा, आयु लगभग 28 वर्ष, निवासी मकान नं. 204, सेक्टर 9, शांतिपुर, ज़िला शांतिपुर, हरियाणा
…प्रतिवादी

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 10 के अंतर्गत न्यायिक पृथक्करण की डिक्री हेतु याचिका

निवेदन है कि:-

1.यह कि याचिकाकर्ता और प्रतिवादी का विवाह दिनांक 14-02-2021 को शांतिपुर में हिंदू रीति-रिवाज़ों से संपन्न हुआ। दोनों पक्षों पर हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 लागू होता है।

2.यह कि इस विवाह से कोई संतान नहीं हुई।

3.यह कि विवाह के बाद पक्ष पति-पत्नी के रूप में साथ रहे, आख़िरी बार मकान नं. 204, सेक्टर 9, शांतिपुर में, और दिनांक 01-06-2024 से वे अलग रह रहे हैं।

4.यह कि याचिकाकर्ता निम्नलिखित आधारों पर न्यायिक पृथक्करण की डिक्री चाहता है, जिनमें से हर एक अधिनियम की धारा 13(1) के अंतर्गत तलाक़ का आधार है:

(क)परित्याग (धारा 13(1)(ib)): प्रतिवादी ने दिनांक 01-06-2024 से, बिना उचित कारण और याचिकाकर्ता की सहमति के बिना या उसकी इच्छा के विरुद्ध, याचिकाकर्ता का परित्याग कर रखा है, और यह परित्याग इस याचिका के प्रस्तुत होने से ठीक पहले लगातार कम से कम दो वर्ष से चला आ रहा है: उस दिन वह यह कहकर वैवाहिक घर से कल्याणपुर में अपने मायके चली गई कि वह वापस नहीं आएगी, और याचिकाकर्ता व उसके माता-पिता के दिनांक 20-07-2024 और 05-01-2025 को वहाँ जाने के बावजूद वह नहीं लौटी;

बाक़ी काग़ज़ दस्तावो में है।

साथ क्या लाएँ

साथ लाने वाले काग़ज़

कहाँ जाना है

वकील के माध्यम से उस ज़िले के पारिवारिक न्यायालय (न हो तो ज़िला न्यायाधीश) में दाख़िल होती है जहाँ विवाह हुआ, जहाँ दूसरा जीवनसाथी रहता है, जहाँ आप आख़िरी बार साथ रहे या, पत्नी के लिए, जहाँ वह अब रहती है। न्यायालय आमतौर पर पहले पक्षों को मध्यस्थता या काउंसलिंग के लिए भेजता है।

फ़ीस

जहाँ ज़रूरी हो, कोर्ट फ़ीस और वेलफ़ेयर टिकट अदालत के दफ़्तर के निर्देश अनुसार लगते हैं; आज की राशि काउंटर पर पूछें। वकील की फ़ीस अलग है।

ध्यान दें

काग़ज़ और फ़ीस बदल सकते हैं। जाने से पहले दफ़्तर से पूछ लें। केवल जानकारी के लिए, अभी वकील ने नहीं जाँची।

स्टाम्प पेपर

इस याचिका या प्रार्थना पत्र पर कोर्ट फ़ीस राज्य के कोर्ट फ़ीस क़ानून से तय होती है; कोर्ट फ़ीस टिकट (या ई-कोर्ट फ़ीस की रसीद) और वेलफ़ेयर टिकट अदालत के दफ़्तर के निर्देश अनुसार लगाएँ।